नाटक की अगली सीट पर बैठ कर मैने कोई ताली न बजायी सारे किरदारों ने ख़ुद से ही पूंछा कया किरदार मंच पर आया नहीं ??

मुझे अपनी बोसीदा फटी हुई बचपन की किताबें मिलीं जिसके हासियों  पर हर वकत मैं कुछ तसवीर सी बनाया करता था चाहा क़ैद कर लूँ उसी वकत को अपने में पर वह दस साल का बच्चा अब मुझी से कह रहा कया अब भी पहाड़ों के पीछे सूरज को कहीं बना पाते हो तुम ??

वह मेरे बहुत करीब है पर मुददतों से नहीं मिला मुझसे कया कहूँ किसी से कुछ जखम हकीमों के बस में नहीं होते ।।

उसे ऐसे ही नहीं कहते नीलकंठ विषधर महामंडलेशवर उसे अपने नुक़सान में भी कायनात के फ़ायदे का जरिया नजर आता है ।।

मैं ख़ुद अपने चिराग बुझा कर आ गया हर रोज हवाओं की हार देखी जाती नहीं ।।

किसी धुँधली सी शाम में लोगों से नज़रें बचा कभी हमने किसी से सरगोशी की वकत बहुत बीत गया पर वह और वह शाम आज भी बहुत दिल के करीब है ।।

ज़िंदगी ——– वह रासते में दिखा मुझे थका थका सा जब मेरे कदम मेरा साथ देने को संघर्ष कर रहे कहा उसने बस कुछ और दूर है मंज़िल तेरी हौसलों को तराश कुछ और पल के लिये देखा ग़ौर से मैने उसकी तरफ पता नहीं वह जिनदगी की बात कर रहा या इस दौड़ की…Continue Reading

आ रहे हैं कुछ साये सरहद पार बरफ को चीर कर मत चलाना गोली अभी कया पता वो हों सही रासते की तलाश में ।।

  कभी तनहाइयों में ही दिल की आवाज को पूरी ताकत से बोल लिया करता हूँ मैं यक़ीनन बहुत सुकून मिलता है उस पल मुझको ।।

मुझे कुछ लिखना है सिरफ इसलिये नहीं कि मुझे तुमसे कुछ कहना है मुझे अपने आप से कुछ कहना है ।