poem

Categories Short Poems

मुझे अपनी बोसीदा फटी हुई बचपन की किताबें मिलीं
जिसके हासियों  पर हर वकत मैं कुछ तसवीर सी बनाया करता था
चाहा क़ैद कर लूँ उसी वकत को अपने में

पर वह दस साल का बच्चा अब मुझी से कह रहा
कया अब भी पहाड़ों के पीछे सूरज को कहीं बना पाते हो तुम ??

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