poem

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माँ तुझे लोगों ने याद किया
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पता नहीं कल कितनों ने सोशल मीडिया पर लिख डाला
कितनों ने अपनी डी पी ही बदल डाली
बडा प्रेम उमड़ा था कल

पर जब सोशल मीडिया नहीं था तब बहुत कम को पता था
मदर्स डे के बारे में
मुझे तो नहीं पता था
कभी मनाया भी नहीं
कभी कहा भी नहीं माँ से
मुबारक हो आपको आज का दिन

जिसने रखा हो नौ महीने पूरे जतन से
जन्म दिया हो बडी असीम पीड़ा को सहकर
उसके लिये एक दिन साल का किसने नियत किया ?

आखिर नौ महीने की तपस्या जन्म देने में
और कई बरसो की तपस्या उसको काबिल बनाने की
आज मोहताज हैं
एक दिन की
सिरफ उसको याद रखने को

आज सुबह से ही लोगों का अपनी डी पी बदलने का काम जारी है
शाम तक सब डी पी याँ बदल जाएँगी
फिर पुराने ढर्रे पर सब लौट जाएँगे

उसने अपने खवाबों को जो थे तेरे लिये
उन सबको टांगों पर चलना सिखाया
समंदर भी जब रात में आँखें बंद कर लहरों को शानत कर सोने की कोशिँश किया करता था
वह अपनी सोती आँखों में तेरे लिये बनाये खवाबों को जगाया करती थी

अब वह मेरे ही सपनों में आकर मेरे ही खवाबों में अपनी जगह ढूँढती है
पूंछती है अपने उसी रौब से मुझसे
जिन जिन लोगों ने कल अपनों को याद किया
कितनों के खवाबों में धुंधली ही सही
कोई तसवीर उस अपने की
आज रात कहीं प्रज्ज्वलित हुई

मेरे पास कोई जवाब नहीं था
न तो मैने डी पी बदली न कहीं कुछ लिखा

न कोई
उसकी तसवीर
प्रज्वलित हुई

मेरे बदकिस्मत सोती जगती आँखों में समाये खवाबों की लम्बी फेरहिसत में

न कोंई खवाब
न कोई खवाबों की तावीर
उसके लियें

जिसने पूरे जतन से बनाया सँवारा मुझको
इस ज़माने में अपने पैरों पर दौड़ने के लिये ।।।

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